अल्मुन्तज़र हिंदी – मुहर्रम १४३३ह

इस्तेग़ासा : क्या करें हवस परस्तों की तूग़यानी बढ़ती जा रही है! हर निहाले चमन के लिए तबर तेज़ किये जा रहे हैं हर ताएरे नग़मा ज़न के लिए

नई नई शक्लों में क़फ़स बनाए जा रहे हैं ! अक़वामे आलम की पेश रफ़ती ने गोशत पोस्त के इन्सान को बला खेज़ हवाए नफ़सी के बाल-ओ-पर दे दिए हैं!…

…जारी

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